Friday, March 11, 2011

दरक रहे हैं विश्वास आधारित रिश्ते

आज देश में हर तरफ़ अशांति है, खून खराबा है, भाई –भाई से लड़ रहा है, दोस्त- दोस्त से लड़ रहा है, कहीं धर्म के नाम पर हत्याएं हो रही हैं, कहीं जाति के नाम पर लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं? समाज की ऐसी स्थति क्यों है? कोई धर्म में इतना अंधा हो गया है कि उसे दूसरे के धर्म में सिर्फ़ बुराइयां ही नज़र आती हैं, समाज को ईश्वर और अल्लाह में बांटने की कोशिश हो रही है| अमन पसंद लोग हैरान हैं, कुछ करना चाहते हैं, वापस अमन और शांति लाना चाहते हैं लेकिन मजबूर हैं| कभी सोचा है हम इतने मजबूर क्यों हैं? महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, लड़कियाँ अपने घर में भी महफूज़ नहीं हैं| विश्वास के रिश्ते दरक रहे हैं आखिर ऐसा क्यों है?

दरअसल यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी| समाज में कुछ लोगों ने हमेशा से अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहा| झूठे अस्तित्व की इस लड़ाई में आज तक समाज पिसता आ रहा है| वर्तमान में देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात अंधेरों में कहीं अपना अस्तित्व तलाशते नज़र आ रहे हैं| हमारे सामने दिक्कत यह है कि हम आज तक अपने असली दुश्मन को पहचान नहीं सके| समाज में जो लोग अशांति फैलाना चाहते हैं उन्हें बेनकाब करना ज़रुरी है| ऐसे लोगों में सबसे ऊपर आते हैं वो लोग जो दो चेहरों के साथ जीते हैं| चेहरे पर नकाब ओढकर जिंदगी जीना जिनकी फितरत है| जो आपके मुह पर आपकी तारीफ और दूसरे के मुह पर उसकी तारीफ़ करते हैं| धर्म में अंधे होकर और परम्पराओं की दुहाई देकर सामाजिक सदभाव को बिगाडना जिनका लक्ष्य होता है| यहां सवाल हिंदू- मुस्लिम का नहीं है, सवाल पुरे मानव समाज का है| क्योंकि अंततः नुकसान मानव समाज का ही होता है|

एक और बात हमारी लड़ाई धर्मान्धता के खिलाफ नहीं होनी चाहिए, और ना ही हमें किसी को यह कहने का हक है कि आप अपना धर्म परिवर्तन कर लीजिए| हमारी लड़ाई उनलोगों से भी नहीं होनी चाहिए जो अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताकर लोगों के धार्मिक उन्माद को भडकाने की कोशिश करते हैं| ऐसे लोगों को हम नज़रंदाज़ कर सकते हैं| लेकिंन हमारी वास्तविक लड़ाई तो उस सिस्टम से होनी चाहिए जो ऐसे लोगों को पैदा करता है| हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए मनुष्य, एक सामाजिक व्यवस्था की उपज है| सामाजिक व्यवस्था जिस प्रकार की होगी उसमे रहने वाले लोग भी उसी मानसिकता से ग्रसित होंगे| इसलिए ऐसे लोग जो यह कहते हैं- वह व्यक्ति ऐसा कर रहा है इसलिए सबसे पहले उसे खत्म करना होगा| कदापि नहीं! अगर हम ऐसा करते हैं तो जाने अनजाने हम उसके काम का समर्थन करेंगे और इससे हमारा मूल उद्देश्य भटकने की प्रबल संभावना है| समस्या का समाधान ज़रुरी है लेकिन उससे भी ज़रुरी है जड़ से समाधान, ताकि फिर ऐसी स्थिति उत्पन्न ना हो|

आज ज़रूरत इस बात की है कि रिश्तों से विश्वास को दरकने से बचाने के ठोस प्रयास किये जाएँ| भावावेश में आकर फैसला ना लेते हुए सही और गलत कि पहचान की जाये| यह सच है कि कहना जितना आसान है करना उतना ही कठिन| हर कदम पर बाधाएँ खड़ी करने वाले लोग हैं लेकिन यह सोचकर हम चुप भी नहीं रह सकते| कवि दुष्यंत कुमार की लिखी हुई पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

“हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए”

परिस्थितियां हमें इसी ओर इशारा कर रही हैं|

गिरिजेश कुमार

7 comments:

  1. I agree with you . We must respect the relationships. They are indeed precious.

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  2. ब्‍लागजगत पर आपका स्‍वागत है ।

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  4. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  5. सच है भावावेश में कोई फैसला नहीं लेना चाहिए....
    अच्छा लिखा है...

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  6. ब्लॉग लेखन में आपका स्वागत है. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए तथा प्रत्येक भारतीय लेखको को एक मंच पर लाने के लिए " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" का गठन किया गया है. आपसे अनुरोध है कि इस मंच का followers बन हमारा उत्साहवर्धन करें , हम आपका इंतजार करेंगे.
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